"वो औरत, जो कभी अपने हिस्से में नहीं आई..."
कहते हैं...
हर इंसान की ज़िंदगी में एक घर होता है...
जहाँ लौटकर उसे सुकून मिलता है।
मैंने भी...
बहुत साल पहले एक घर में कदम रखा था।
लेकिन...
आज तक समझ नहीं पाई...
मैं घर में आई थी...
या...
एक ऐसी परीक्षा में,
जिसकी कोई आख़िरी तारीख़ लिखी ही नहीं गई थी।
शुरुआत में
मैंने हर ताने को
सलाह समझा।
हर अपमान को
अपनी कमी।
हर आँसू को
अपनी गलती।
क्योंकि...
मुझे बचपन से
इतना ही सिखाया गया था...
"रिश्ते बचाने हों...
तो ख़ुद को थोड़ा-थोड़ा खोना पड़ता है।"
मुझे क्या पता था...
कि...
एक दिन
मैं पूरी की पूरी खो जाऊँगी।
मैंने देखा है...
कुछ शब्द
हाथों से नहीं बोले जाते।
फिर भी...
वो उम्रभर
गाल पर पड़े थप्पड़ से
ज़्यादा दर्द देते हैं।
सास के ताने...
ननद की बेरुख़ी...
धीरे-धीरे
मेरे भीतर
एक ऐसा कमरा बनाते गए...
जहाँ...
मैंने अपनी हँसी बंद करके रख दी।
लोग कहते हैं...
समय हर घाव भर देता है।
झूठ कहते हैं।
कुछ घाव भरते नहीं...
बस...
इंसान
उनके साथ जीना सीख जाता है।
फिर...
एक दिन
ज़िंदगी ने
मेरे दरवाज़े पर
दोस्ती रख दी।
मैंने...
बरसों बाद
अपने दिल की खिड़की खोली।
अपने डर...
अपने आँसू...
अपनी चुप्पियाँ...
सब उसके हवाले कर दीं।
मुझे लगा...
अब मेरा बोझ
आधा हो जाएगा।
मगर...
मुझे क्या पता था...
कुछ लोग
कंधा देने नहीं आते...
वो...
बस ये देखने आते हैं...
कि...
तुम सबसे ज़्यादा कमज़ोर
कहाँ हो।
जिस दिन
मेरे नाम के आगे
झूठ लिखा गया...
उस दिन
मैं अदालत में नहीं थी।
मैं...
अपने ही विश्वास के अंतिम संस्कार में खड़ी थी।
पुलिस स्टेशन की दीवारें
मेरी आवाज़ पहचानती थीं।
अदालत के बरामदे
मेरे क़दम।
लेकिन...
जिन लोगों की उँगली पकड़कर
मैंने रिश्तों पर भरोसा करना सीखा था...
वो...
उस दिन
अपनी नज़रें झुकाकर
मेरे पास से गुज़र गए।
उस शाम...
घर लौटकर
मैंने आईने में देखा।
चेहरा मेरा था।
आँखें भी मेरी थीं।
बस...
यक़ीन...
कहीं दिखाई नहीं दिया।
और उसी दिन...
मैंने
लोगों पर नहीं...
उम्मीद पर विश्वास करना छोड़ दिया।
फिर...
भगवान ने
मेरी गोद में
एक ऐसा बच्चा रखा...
जिसे दुनिया
"कमज़ोर" कहती रही।
मैंने...
उसे सीने से लगाकर
सोचा...
दुनिया...
कितनी जल्दी
नाम रख देती है।
जिसे वो कमज़ोरी कहते हैं...
मैं उसे
अपनी सबसे बड़ी वजह कहती हूँ।
रात...
जब पूरा शहर
नींद की चादर ओढ़ लेता...
मैं...
अपने बच्चे की साँसें गिनती।
कहीं...
उसकी बेचैनी
मेरी गोद से बाहर न चली जाए।
कहीं...
उसका दर्द
उसकी मुस्कान से बड़ा न हो जाए।
और...
हर रात
भगवान से
एक ही बात कहती...
"अगर दर्द बाँटना हो...
तो इसका हिस्सा भी मुझे दे देना।"
सुबह...
मैं फिर वही थी।
ऑफ़िस।
घर।
रसोई।
दवाइयाँ।
ज़िम्मेदारियाँ।
और...
एक मुस्कान...
जिसे पहनना
अब मेरी आदत नहीं...
मेरी ड्यूटी बन चुकी थी।
जानते हो...
औरतें कब बूढ़ी होती हैं?
जब उनके बाल सफ़ेद होते हैं?
नहीं।
जब उनके चेहरे पर झुर्रियाँ आती हैं?
नहीं।
औरत...
उस दिन बूढ़ी हो जाती है...
जिस दिन...
वो अपने लिए
दुआ माँगना छोड़ देती है।
अब...
मैं भगवान से
कुछ नहीं माँगती।
न लंबी उम्र।
न खुशियाँ।
न अपने लिए
एक भी आसान दिन।
मैं बस...
इतना चाहती हूँ...
कि...
मेरे जाने के बाद
किसी को
ये मत कहना पड़े...
"काश..."
और आख़िर में...
अगर...
कभी...
तुम्हें
कोई ऐसी औरत मिले...
जो...
हर दुख के बाद भी
सबके लिए चाय बना दे।
हर अपमान के बाद भी
घर की रोटी गोल बना दे।
हर धोखे के बाद भी
बच्चे के माथे को
उतने ही प्यार से चूमे।
तो...
उसे मज़बूत मत कहना।
क्योंकि...
मज़बूत लोग नहीं होते।
बस...
कुछ लोग
अपने हिस्से का रोना
टालते-टालते
पूरी ज़िंदगी गुज़ार देते हैं।
और...
जब एक दिन
वो इस दुनिया से जाते हैं...
तो...
उनकी अलमारी में
महँगे कपड़े नहीं मिलते।
मिलते हैं...
कुछ तह करके रखे हुए दर्द...
कुछ अधूरी नींदें...
कुछ अनकहे वाक्य...
और...
एक ज़िंदगी...
जो...
हर किसी के नाम लिखी गई...
सिवाय...
अपने।
अंतिम पंक्तियाँ
उसकी चिता पर
सब रो रहे थे...
किसी ने कहा...
"बहुत अच्छी औरत थी..."
किसी ने कहा...
"बहुत त्याग किया उसने..."
मैंने...
आसमान की तरफ़ देखा...
और मन ही मन सोचा...
कितना अजीब है ना...
जिस औरत को जीते-जी...
दो पल चैन से बैठने की इजाज़त नहीं मिली...
आज...
उसी के लिए सबके पास समय है।
शायद...
कुछ औरतें मरने के बाद नहीं...
पहली बार तभी जीती हैं...
जब दुनिया उन्हें खो देती है।
~ समाप्त ~
Dilse Diaries by Pooja.K
कुछ कहानियाँ किताबों में नहीं मिलतीं... वे हमारे आसपास चलती-फिरती ज़िंदगियों में मिलती हैं।
यह रचना उन सभी महिलाओं को समर्पित है जिन्होंने अपने हिस्से की खुशियों से पहले हमेशा दूसरों की मुस्कान को चुना।
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