# जहाँ अपने ही पराए लगें… वहाँ घर याद आता है
रिश्ते हमेशा शब्दों से नहीं टूटते।
कभी-कभी उनका बदलता हुआ व्यवहार ही
बहुत कुछ कह देता है।
हम किसी अपने के घर
प्यार और अपनापन लेकर जाते हैं,
लेकिन वहाँ कुछ ऐसी ख़ामोशियाँ मिलती हैं
जिनका कोई जवाब नहीं होता।
सबसे ज़्यादा तकलीफ़ तब होती है
जब वही व्यवहार
हमारी आँखों के सामने
हमारी माँ को भी चोट पहुँचाए।
उस समय इंसान
बहस नहीं करना चाहता।
बस चुपचाप
उस जगह से निकल जाना चाहता है
जहाँ उसके होने से किसी को परेशानी हो।
आज की यह कविता
उसी एहसास के नाम है—
"कुछ घर ऐसे भी होते हैं,
जहाँ जाकर
घर लौटने का मन करने लगता है…
हम हँसकर मिलते रहे,
वो हर हँसी में
कमी निकालते रहे।
हमने रिश्तों को
दिल से निभाया,
उन्होंने हर अपनापन
जैसे कोई गलती समझा।
मैं चुप रहा…
क्योंकि रिश्ते थे,
माँ चुप रहीं…
क्योंकि संस्कार थे।
पर उनकी आँखों में
जो दर्द देखा,
वो मेरी ख़ामोशी से
सहन नहीं हुआ।
अजीब है ना…
कभी-कभी
अपनों के बीच रहकर भी
इंसान इतना अकेला हो जाता है
कि उसे बस
अपने घर की दीवारें याद आती हैं।
अब न कोई सफ़ाई देंगे,
न किसी से गिला करेंगे…
बस माँ का हाथ थामेंगे,
और चुपचाप लौट जाएँगे।
क्योंकि…
जहाँ हमें देखकर
किसी का चेहरा उतर जाए,
वहाँ ठहरने से बेहतर है—
उस जगह लौट जाना,
जहाँ हमारा होना
किसी के लिए बोझ नहीं,
सुकून होता है।"
शायद रिश्तों की सबसे बड़ी खूबसूरती
यह नहीं कि हम हर जगह स्वीकार किए जाएँ…
बल्कि यह है कि
हम जानते हों
कहाँ हमारा दिल सुरक्षित है।
और कभी-कभी
उस जगह का नाम
सिर्फ़ एक होता है—
"घर।"
❤️ DilSe Diaries
✍️ Pooja.K
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