# दिल को कैलेंडर पढ़ना नहीं आता...
कभी-कभी एक फ़ोन की घंटी पूरे दिन की धड़कन बदल देती है। हम बिना स्क्रीन देखे ही मन में किसी एक नाम को पढ़ लेते हैं। शायद इसलिए नहीं कि हमें यकीन होता है, बल्कि इसलिए कि उम्मीद अभी भी ज़िंदा होती है।
समय आगे बढ़ जाता है, तारीख़ें बदल जाती हैं, लेकिन दिल का अपना कैलेंडर होता है। उसे महीनों और सालों का हिसाब नहीं आता। वह हर सुबह एक नई उम्मीद लेकर उठता है और हर शाम चुपचाप उसे अपने भीतर रख लेता है।
आज की यह ओरिजिनल कविता उसी एहसास को शब्द देती है—
"आज फ़ोन बजा...
दिल ने
बिना देखे ही
तुम्हारा नाम पढ़ लिया।
लेकिन
स्क्रीन पर
कोई और था।
तब समझ आया...
इंतज़ार
आँखें नहीं करतीं,
दिल करता है।
और
दिल को
कैलेंडर पढ़ना नहीं आता...
उसे तो
हर दिन
यही लगता है—
'शायद आज...'"
अगर इस कविता ने आपके दिल की किसी अधूरी उम्मीद को छू लिया हो, तो इसे उन लोगों के साथ ज़रूर साझा करें जो जानते हैं कि कुछ इंतज़ार कभी पुराने नहीं होते।
❤️ DilSe Diaries
✍️ Pooja.K
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