# अब कोई मैसेज आना नहीं था...
कुछ इंतज़ार समय के साथ खत्म नहीं होते। वे बस अपना रूप बदल लेते हैं।
एक दिन खिड़की खुली रह जाती है। हवा कमरे में आती रहती है। टेबल पर रखी चाय ठंडी हो जाती है। फोन घंटों से Silent पड़ा रहता है। फिर भी हाथ बार-बार उसी स्क्रीन तक पहुँच जाता है जहाँ अब कोई मैसेज आने वाला नहीं होता।
तब एहसास होता है कि हम किसी इंसान का इंतज़ार नहीं कर रहे थे। हम उस एहसास को ढूँढ़ रहे थे जिसमें कभी हमारी पूरी दुनिया बसती थी।
आज की यह ओरिजिनल सिनेमैटिक कविता उसी खामोशी को शब्द देती है—
"आज
खिड़की खुली रह गई...
हवा
धीरे-धीरे
कमरे में आती रही।
टेबल पर रखी
चाय
कब की ठंडी
हो चुकी थी।
फोन भी
कई घंटों से
Silent पर था...
...
मैंने मुस्कुराकर कहा...
'अब किसी इंसान का नहीं...
बस उस एहसास का...
जिसमें कभी मैं बहुत खुश हुआ करता था।'"
अगर इस कविता ने आपके दिल में किसी पुराने एहसास को जगा दिया हो, तो इसे उन लोगों के साथ ज़रूर साझा करें जो जानते हैं कि कुछ इंतज़ार कभी पूरी तरह खत्म नहीं होते।
❤️ DilSe Diaries
✍️ Pooja.K
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