❤️ माँ माँ को समझना हो तो उसके शब्दों को नहीं… उसकी ख़ामोशियों को पढ़ना। वो “मैं ठीक हूँ” कहकर कितनी बार अपना दर्द छुपा लेती है, इसका हिसाब शायद उसकी आँखों के पास होता है। हम बड़े होते गए, अपने सपनों में उलझते गए, और माँ धीरे-धीरे हमारी ज़िंदगी के किनारे होती गई। जिसने हमारी छ…