# इस बार राखी नहीं बाँध पाऊँगी…
रक्षाबंधन सिर्फ़ एक त्योहार नहीं है। यह उन यादों का दिन है, जब भाई की कलाई पर बँधा एक छोटा-सा धागा बहन के पूरे प्यार को अपने भीतर समेट लेता है।
लेकिन हर साल ऐसा नहीं होता कि भाई-बहन एक-दूसरे के पास हों।
कभी पढ़ाई दूरी बना देती है,
कभी नौकरी,
कभी शादी,
कभी ज़िम्मेदारियाँ…
और कभी बस ज़िंदगी अपने रास्ते अलग कर देती है।
ऐसी ही एक बहन की कहानी है, जिसके हाथ में इस बार भी राखी है, थाली भी सजी है, मगर भाई की कलाई उसके हाथों से दूर है।
वह शायद पिछले साल को याद करेगी—
वही भाई,
वही कलाई,
वही राखी,
वही मुस्कान…
बस इस बार एक चीज़ कम होगी—
भाई उसके सामने नहीं होगा।
वह राखी हाथ में लेकर उसकी तस्वीर देखेगी और मन ही मन कहेगी—
“भैया,
आज तेरी कलाई पर राखी नहीं बाँध पाई,
तो क्या हुआ…
मेरी दुआओं ने
तेरी कलाई आज भी थाम रखी है।
बस इस बार
धागा दूर है…
बहन का प्यार नहीं।”
यही तो इस रिश्ते की खूबसूरती है।
राखी हाथ से बँधती है,
लेकिन रिश्ता दिल से।
और दिल से जुड़े रिश्तों को
मीलों की दूरी भी अलग नहीं कर सकती।
इस रक्षाबंधन उन सभी भाई-बहनों के नाम,
जो एक-दूसरे से दूर हैं,
लेकिन एक-दूसरे के दिल में आज भी उतने ही पास हैं।
Written by:- Pooja.K by Dilse Diaries
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