❤️ पापा
पापा को समझना हो तो
उनकी बातों से ज़्यादा
उनकी ख़ामोश मेहनत देखना…
माँ की तरह
वो हर दर्द पर प्यार नहीं जताते,
कई बार तो
दर्द पूछने पर भी बस इतना कहते हैं—
“कुछ नहीं हुआ।”
बचपन में लगता था,
पापा बस डाँटते हैं…
बड़े होकर समझ आया—
उनकी हर डाँट के पीछे
एक डर छुपा था,
कि कहीं हम ज़िंदगी की ठोकरों से
बहुत टूट न जाएँ।
उन्होंने अपनी इच्छाओं को
हमारी ज़रूरतों के पीछे रखा,
अपनी थकान को
हमारी मुस्कान के पीछे छुपाया।
कितनी बार उन्हें भी
कुछ खरीदने का मन हुआ होगा,
कहीं घूमने का मन हुआ होगा,
आराम करने का मन हुआ होगा…
मगर उन्होंने अक्सर
“अभी नहीं” कहकर
हमारे लिए “ज़रूरी” चुन लिया।
और हम बड़े होते गए…
हमें उनकी जेब की चिंता रही,
उनकी उम्र की नहीं।
हमें उनकी सख़्ती याद रही,
उनकी कुर्बानियाँ नहीं।
सच तो ये है—
पापा वो छाँव हैं
जिसकी कीमत धूप में आने के बाद समझ आती है।
और एक दिन
जब हम उन्हें पहले से थोड़ा धीमा चलते देखेंगे,
तब शायद दिल चुपके से पूछेगा—
“जिसने पूरी उम्र
मेरे लिए दौड़ लगाई…
मैं उसके साथ
थोड़ा और क्यों नहीं चला?” ❤️
Dilse Diaries ✍🏻 Pooja.K
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