❤️ माँ
माँ को समझना हो तो
उसके शब्दों को नहीं…
उसकी ख़ामोशियों को पढ़ना।
वो “मैं ठीक हूँ” कहकर
कितनी बार अपना दर्द छुपा लेती है,
इसका हिसाब शायद
उसकी आँखों के पास होता है।
हम बड़े होते गए,
अपने सपनों में उलझते गए,
और माँ धीरे-धीरे
हमारी ज़िंदगी के किनारे होती गई।
जिसने हमारी छोटी-सी चोट पर
पूरी रात जागकर गुज़ारी,
उसी की थकान
हमें अक्सर दिखाई नहीं देती।
बचपन में लगता था—
माँ को सब आता है।
बड़े होकर समझ आया—
माँ को सब नहीं आता था…
वो बस हमारे लिए
हर मुश्किल के सामने खड़ी हो जाती थी।
उसने हमारे लिए
कितनी इच्छाएँ छोड़ीं,
कितनी बार अपनी पसंद टाली,
कितनी बार रोकर भी
हमारे सामने मुस्कुराई…
और बदले में
उसे कभी बहुत कुछ चाहिए भी नहीं था।
बस हमारा एक फ़ोन,
एक “माँ, कैसी हो?”
और कभी-कभी
बिना किसी काम के
उसके पास बैठ जाना।
क्योंकि माँ को
हमारी कामयाबी से ज़्यादा
हमारी मौजूदगी की आदत होती है।
और सच कहूँ…
दुनिया में बहुत से रिश्ते
हमारी ज़रूरत से जुड़े होते हैं,
लेकिन माँ…
वो रिश्ता है जिसकी ज़रूरत नहीं,
बस हमारा होना ही काफ़ी है। ❤️
Dilse Diaries ✍🏻 Pooja.K
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