कुछ रिश्ते दरवाज़े जैसे होते हैं
कुछ रिश्ते दरवाज़े जैसे होते हैं—
सामने से अपने लगते हैं,
मगर जैसे ही भीतर जाओ,
पता चलता है—
दरवाज़ा खुला था,
दिल नहीं।
ज़िंदगी में हम कई रिश्तों को सिर्फ़ इसलिए अपना मान लेते हैं क्योंकि उनके दरवाज़े हमारे लिए खुले होते हैं।
बात करने की जगह होती है,
मिलने की वजह होती है,
मुस्कुराकर स्वागत भी होता है।
लेकिन जब दिल तक पहुँचने की कोशिश करते हैं,
तो एक अजीब-सी दूरी महसूस होती है।
तब समझ आता है कि
हर खुला दरवाज़ा अपनापन नहीं होता।
कुछ लोग हमें अपनी ज़िंदगी में जगह तो देते हैं,
लेकिन अपने दिल में नहीं।
और शायद रिश्तों की सबसे ख़ामोश सच्चाई यही है—
किसी के पास होना और
किसी का अपना होना,
दो बिल्कुल अलग बातें हैं।
इसलिए हर उस दरवाज़े को अपना घर मत समझ लेना
जो तुम्हारे लिए खुला हो।
कभी-कभी दरवाज़े खुले रहते हैं,
सिर्फ़ इसलिए...
ताकि हमें यह एहसास न हो
कि दिल कब का बंद हो चुका है।
— Dilse Diaries by Pooja.K
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