समर्पण
समर्पण का मतलब
सिर्फ़ किसी के आगे झुक जाना नहीं होता…
कभी-कभी समर्पण का अर्थ होता है—
अपने “मैं” को थोड़ा पीछे रखकर
किसी रिश्ते को बचा लेना।
जहाँ हर बात पर
जीतने की ज़िद नहीं होती,
वहाँ प्रेम धीरे-धीरे
गहरा होने लगता है।
समर्पण वो नहीं
कि आप अपनी पहचान खो दें,
अपनी ख़ुशियाँ छोड़ दें
या हर बार ख़ुद को ही ग़लत मान लें।
सच्चा समर्पण वहाँ होता है,
जहाँ इंसान अपनी इच्छा से
किसी के साथ खड़ा रहना चुनता है—
बिना किसी डर, दबाव या मजबूरी के।
कभी किसी की ख़ामोशी समझ लेना,
कभी अपनी नाराज़गी छोड़ देना,
कभी “मैं सही हूँ” साबित करने के बजाय
“हम ठीक रहें” चुन लेना…
शायद यही समर्पण है।
क्योंकि रिश्तों में
हर बार अपनी बात मनवा लेना
रिश्ता नहीं बचाता…
कभी-कभी
थोड़ा झुकना पड़ता है,
थोड़ा समझना पड़ता है,
और थोड़ा अपने अहंकार को
चुप कराना पड़ता है।
क्योंकि जहाँ प्रेम सच्चा हो,
वहाँ समर्पण हार नहीं होता…
वो रिश्ते को
ख़ुद से ऊपर रखने की
ख़ूबसूरत कला होती है। ❤️
Dilse Diaries ✍🏻 Pooja.K
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